<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7988966999489198762</id><updated>2011-10-24T10:29:45.287-07:00</updated><category term='साभार  सीडैक'/><title type='text'>कथा  -  कहानी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khulasa123.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7988966999489198762/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulasa123.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Khulasa Times Vision</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13626249132771648393</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='19' src='http://4.bp.blogspot.com/_sBfAl1_uFp0/SJniX6almvI/AAAAAAAAAXM/sOUbkCroecs/s1600-R/khulasatv.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>2</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7988966999489198762.post-843652859661785626</id><published>2008-10-28T08:43:00.000-07:00</published><updated>2008-10-28T08:51:01.588-07:00</updated><title type='text'>हिम्मत न हारिए</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कहिए साहब&lt;/span&gt;, क्या मामला है? अरे आप इतने उदास क्यों है। आपकी आंखों मे आंसू क्यों छलछला रहे है। आपके चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही है?&lt;br /&gt;    ओहो, आप मुसीबतों मे जूझते-बूझते थक गये है। घर मे बीमारी है, बच्चो की पढाई का बोझ है, लड़की का जल्दी ही ब्याह होना है, बीसियों खर्च सिर पर है, पर पैसे की तंगी है। रात-दिन परेशानियों से आपका हौसला पस्त हो गया है, आपकी हिम्मत जवाब दे गयी है। चारों ओर अंधकार दिखाई देता है। कोई रास्ता ही नही सूझता।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;भाई, आपके साथ मेरी सहानूभूति है और मै चाहता हूं कि आपकी परेशानियां जल्दी-से-जल्दी दूर हो। पर मेरी एक बात का जवाब दीजिए। क्या आपके इतनी चिन्ता करने, इतना हैरान होने और निराश होकर हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ जाने से आपकी कोई समस्या हल हुई है? हल होने में मदद मिली है? बीमारी को कोई फायदा पहुंचा हैं? बच्चों की पढाई का बोझ हल्का हुआ है? लड़की की शादी के लिए रास्ता निकला है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    वाह, आपने भी अच्छा सवाल किया! अजी, मुसीबत आती है तो किसे हैरानी नही होती? चोट लगती है तो किसके दर्द नही होता? जब चारों तरफ के रास्तें बंद हो जाते है तो किसका दिल नही टूटता? इंसान ही तो है! बहुत ज्यादा बोझ आखिर कब तक उठा सकता हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने इतनी बातें कह डाली, पर मेरे सवाल का ज़वाब मुझे नही मिला। मैने पूछा था कि क्या फ्रिक करने और हिम्मत हारने से आपकी मुश्किलें कम हुई? कठिनाइयों मे से रास्तें निकला?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जी नही, मेरी समस्याएँ ज्यो-की-त्यों बनी है, बल्कि बढ़ी ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब आप बताइए कि आपने चिन्ता करके, हिम्मत हार करके , क्या पाया? किसी ने ठीक ही कहा है, चिन्ता चिता के समान है। वह आदमी को खा जाती है और जो चिता के वश मे हाकर हौसला छोड़ बैठते है, उनकी नाव डूब जाती है। रूकावटें किसके रास्ते मे नही आती? लेकिन उनसे पार वे ही पाते है, जो उनके आगे सिर नही झुकाते, उनका मुक़ाबला करते हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुतुरमुर्ग का नाम आपने सुना होगा। जब कोई खतरा आता है तो वह डर के मारे अपना मुँह धरती मे गाड़ लेता है। जानते है, इसका नतीजा क्या होता है? बड़ी आसनी से मौत उसे अपने पंजे मे जकड़ लेती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    शुतुरमुर्ग जानवर होता है और माना जाता है कि बहुत-से जानवरों मे अक़ल की कमी होती है। पर आदमी तो अक़लमन्द कहलाता है। ऐसी लाचारी उसके लिए शोभा नही देती। मर्द तो वह है, जिसकी हिम्मत के सामने तूफान भी थरथरा उठे।&lt;br /&gt;    कोलम्बस की कहानी आपने पढ़ी होगी। वह एक छोटा-सा जहाज लेकर नयी दुनिया की खोज करने के लिए महासागर मे निकल पड़ा था। अचानक तूफान आ गया। तीन दिन तक उसका जहाज लहरों से टक्कर लेता रहा। इतने मे उसका एक मस्तूल ख़राब हो गया। उन दिनों जहाज इंजन से नही चलते थे। ऊँची बल्लियां। लगाकर उन पर पाल तान देते थे। पालों में हवा भर जाती थी और उससे जहाज चलते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार उसके जहाज का मस्तूल ख़राब हो गया मस्तूल का खराब होना मामूली बात  नही थी। उसके माने थे  जहाज का खतरा, आदमियों की जान को ख़तरा। उसके संगी-साथी घबरा गये। उन्होने कहा, "अब हम आगे नही जायेगें। देश लौट  जायेंगें। कोलम्बस बड़ा साहसी था। उसने मॉँझियों का  हौसला बढ़ाया। बोला, "जरा-सी बात पर हाथ-पैर फुला दोगे तो उससे क्या होगा? तूफान हमारी परीक्षा ले रहा है। हम हार नही मानेगें।"&lt;br /&gt;    मॉँझियों की खोई हिम्मत लौट आयी। पर ज़रा आगे बढ़े कि उनकी कुतुबुनुमा बिगड़ गयी। कुतुबुनुमा दिशा बताने वाली घड़ी होती है। उसके ख़राब होने से यह पता लगना कठिन हो गया कि वे किधर जा रहे है। पर कोलम्बस की रग-रग मे हिम्मत भरी थी। मॉँझियों को&lt;br /&gt;समझाकर उसने कहा, "मै आपसे कहता हूँ, कितनी भी मुश्किले आयें, पर जीत हमारी जरुर होगी।"&lt;br /&gt;    और उसकी बात सच निकली। वे आगे बढते गये। उनके हर्ष का ठिकाना न रहा, जब उन्हें अकस्मात् पानी पर झाड़ियों की लकड़ियॉँ तैरती दिखाई दी और आकाश मे उड़ते हुए पक्षी नज़र आये। उन्हे नयी दुनिया मिल गयी, जिसकी तलाश मे वे निकले थे।&lt;br /&gt;    अब आप बताइए, अगर तूफान के आने, मस्तूल के खराब होने और कुतुबनुमा के बिगड़ जाने पर कोलम्बस ने हार मान ली होती तो क्या होता? दुनिया एक बहुत बड़ी खोज से वंचित रह जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो साहब आप काहे को हार माने बैठे हैं चलिये उठिये नये सिरे से प्रयास करते हैं  ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7988966999489198762-843652859661785626?l=khulasa123.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulasa123.blogspot.com/feeds/843652859661785626/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7988966999489198762&amp;postID=843652859661785626' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7988966999489198762/posts/default/843652859661785626'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7988966999489198762/posts/default/843652859661785626'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulasa123.blogspot.com/2008/10/blog-post_3152.html' title='हिम्मत न हारिए'/><author><name>Khulasa Times Vision</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13626249132771648393</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='19' src='http://4.bp.blogspot.com/_sBfAl1_uFp0/SJniX6almvI/AAAAAAAAAXM/sOUbkCroecs/s1600-R/khulasatv.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7988966999489198762.post-4288569497582487418</id><published>2008-10-28T08:23:00.000-07:00</published><updated>2008-10-28T08:36:33.746-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साभार  सीडैक'/><title type='text'>आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; रूस&lt;/span&gt; में एक बहुत बड़े लेखक हुए हैं, इतने बड़े कि सारी दुनिया उन्हें जानती है। उनका नाम था लियो टॉल्स्टॉय, पर हमारे देश में उन्हें महर्षि टॉल्स्टॉय कहते है। उन्होंने बहुत-सी किताबें लिखी है। इन किताबों में बड़ी अच्छी-अच्छी बातें है। उनकी कहानियों का तो कहना ही क्या! एक-से एक बढ़िया है। उन्हें पढ़ते-पढ़ते जी नहीं भरता।&lt;br /&gt;इन्हीं टॉल्स्टॉय की एक  कहानी है-आदमी को कितनी जमीन चाहिए.?&lt;span&gt;&lt;/span&gt; इस कहानी में उन्होंने यह नहीं बताया कि हर आदमी को अपनी गुज़र-बसर कें लिए कितनी  ज़मीन की जरूरत है। उन्होनें तो दूसरी ही बात कहीं है। वह कहते हैं कि आदमी ज्यादा-से-ज्यादा जमीन पाने के लिए कोशिश करता है, उसके लिए हैरान होता है, भाग-दौड़ करता है, पर आखिर में कितनी जमीन उसके काम आती है? कुल छ:फुट, जिसमें वह हमेशा के लिए सो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यों कहने को यह कहानी है, पर इसमें दो बातें बड़े पते की कही गयी है। पहली यह कि आदमी की इच्छाऍं, कभी पूरी नही होतीं। जैसे-जैसे आदमी उनका गुलाम बनता जाता है, वे और बढ़ती जाती हैं। दूसरे, आदमी आपाधापी करता है, भटकता है, पर अन्त में उसके साथ कुछ भी नहीं जाता।&lt;br /&gt;   आपको शायद मालूम न हो, यह कहानी गांधीजी को इतनी पसन्द आयी थी कि उन्होनें इसका गुजराती में अनुवाद किया। हजारों कापियॉँ छपीं और लोगों के हाथों में पहुँचीं। धरती के लालच में भागते-भागते जब आदमी मरता है तो कहानी पढ़ने वालों की ऑंखे गीली हो आती है। उनका दिल कह उठता है-ऐसा  धन किस काम का ।&lt;br /&gt;   अपनी इस काहानी में टॉल्सटॉय ने जो बात कही है, ठीक वहीं बात हमारे साधु-सन्त, और त्यागी-महात्मा सदा से कहते आये है। उन्होने कहा है कि यह दुनिया एक माया-जाल है। जो इसमें फँसा कि फिर निकल नहीं पाता। लक्ष्मी यानी धन-दौलत को उन्होंने चंचला माना है। वे कहते हैं, पैसा  किसी के पास नहीं टिकता। जो आज राजा है, वही कल को भिखारी बन जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिये इसी बात को एक कहानी के द्वारा समझते हैं -&lt;br /&gt;     एक धनी आदमी था। वह ओर उसकी स्त्री, दोनों हर घड़ी पेरशान रहते थे और अक्सर आपस में लड़ते रहते थे। उनका पड़ोसी गरीब था, दिन-भर मजूरी करता था। औरत घर का काम करती थी। रात को दोनों चैन की नींद सोते थे। एक दिन धनी स्त्री ने कहा, इन  पड़ोसियों को देखो, कैसे चैन से रहते हैं! आदमी  ने कहा, ठीक कहती  हो।&lt;br /&gt;   अगले दिन उसने किया क्या कि पोटली में निन्यानवे रुपये बॉँधे और उसे गरीब पड़ोसी के घर में डाल दिया। पड़ोसी ने रूपये देखे। उसकी आँखे चमक उठीं। उसी घड़ी लोभ ने उसे धर दबोचा। वह निन्यानवे के सौ और सो के एक सौ एक करने में लग गया। फिर क्या था! उसकी नींद हराम हो गयी। सुख भाग गया। मेहनत की खरी कमाई का आनन्द सपना हो &lt;span&gt;गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;    हममें से ज्य़ादातर लोग ऐसे ही चक्कर में पड़े है। हम यह भूल जाते है कि इस चक्कर में कहीं सुख है तो वह नकली है। सुख से अधिक दु:ख है। असल में पैसा अपने-आपमें बुरा नहीं है। बुरा है उसका मोह। बुरा है उसका संग्रह। रोज़ी-पाने का अधिकार सबको  है, पर पैसा जोड़कर रखने का अधिकार किसी को भी नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7988966999489198762-4288569497582487418?l=khulasa123.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khulasa123.blogspot.com/feeds/4288569497582487418/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7988966999489198762&amp;postID=4288569497582487418' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7988966999489198762/posts/default/4288569497582487418'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7988966999489198762/posts/default/4288569497582487418'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khulasa123.blogspot.com/2008/10/blog-post_28.html' title='आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए'/><author><name>Khulasa Times Vision</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13626249132771648393</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='19' src='http://4.bp.blogspot.com/_sBfAl1_uFp0/SJniX6almvI/AAAAAAAAAXM/sOUbkCroecs/s1600-R/khulasatv.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
